भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड दुनिया का सबसे धनी और शक्तिशाली बोर्ड है, ये हम सब जानते हैं. उसके दमख़म का लोहा पूरी दुनिया मानती है. लेकिन इन सबके बावजूद बीसीसीआई गाहे-बगाहे आपको ये अहसास दिलाना नहीं भूलती कि उसकी औकात क्या है और हम क्रिकेट प्रेमियों की औकात क्या है.यही बात क्रिकेटरों के साथ भी लागू होती है. क्रिकेटरों को भी ये समझना पड़ता है कि जिस बड़ी संस्था के साए तले उनका करियर चल रहा है, वो समय-समय पर बेवजह उनका टायर पंचर कर सकता है.
विश्व विजेता बने भारतीय टीम को ज़्यादा समय नहीं हुए हैं, लेकिन इस विश्व विजेता टीम के एक अहम किरदार को क्रिकेट बोर्ड उसकी औकात बता रहा है.
विश्व विजेता बनने के बाद मैदान में ख़ुशी से फूट-फूट कर रोने वाले शख़्स को बोर्ड ख़ून के आँसू रुलाने की प्रतिज्ञा कर चुका है, तो आप हम उसका क्या बिगाड़ सकते हैं.
वेस्टइंडीज़ दौरे के लिए भारतीय वनडे टीम का ऐलान हुआ है. विधानसभा चुनाव के नतीजों की मारा-मारी में भारतीय टीम का ऐलान हुआ. सीनियर खिलाड़ियों को आख़िरकार आराम देने की मांग मान ली गई.
महेंद्र सिंह धोनी नहीं जाएँगे, सचिन तेंदुलकर नहीं जाएँगे और ज़हीर ख़ान नहीं जाएँगे. सहवाग तो पहले ही आउट हो चुके हैं. तो घंटों की माथा-पच्ची के बाद बोर्ड ने नए कोच डंकन फ़्लेचर की मौजूदगी में टीम का चयन किया.
टीम की कप्तानी गौतम गंभीर करेंगे और उप कप्तानी सुरेश रैना करेंगे. सिर चकराया कि कहीं युवराज सिंह को भी तो आराम नहीं दिया गया है. लेकिन खिलाड़ियों का नाम देखते-देखते सूची में युवराज सिंह भी उनमें नज़र आए.
सदमा सा लगा. क्या युवराज सिंह भारतीय टीम के उप कप्तान बनने के लायक़ भी नहीं. वैसी स्थिति में जबकि टीम में सहवाग भी नहीं हैं, सचिन भी नहीं हैं और कप्तान धोनी भी नहीं हैं.
सुरेश रैना अच्छे खिलाड़ी हैं और भविष्य में टीम की बागडोर भी संभाल सकते हैं लेकिन युवराज के सामने उन्होंने बहुत कम क्रिकेट खेली है. देखा जाए तो क़ायदे से युवराज को टीम की कप्तानी मिलनी चाहिए थी और वो भी बहुत पहले.
जीत की अहम कड़ीगौतम गंभीर से क़रीब तीन साल पहले अपने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की शुरुआत करने वाले युवराज ने अपने क्रिकेट जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं लेकिन हर बार वे मुश्किलों से उबर कर एक स्टार खिलाड़ी के रूप में सामने आए हैं.
भारतीय क्रिकेट को उनका योगदान भूलना नहीं चाहिए. धोनी की कप्तानी में भारत दो बार विश्व चैम्पियन बना है, एक बार ट्वेन्टी-20 का तो दूसरी बार 50-50 का. इन दोनों ही विश्व कप में युवराज टीम की रीढ़ साबित हुए हैं.
2011 के विश्व कप में तो कई अहम मौक़े पर न सिर्फ़ बल्ले बल्कि गेंद से भी उन्होंने अपना कमाल दिखाया है. ये कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं कि युवराज भारतीय टीम की ख़िताबी जीत की अहम कड़ी थे.
विश्व कप में मैन ऑफ़ द टूर्नामेंट चुने जाने वाले युवराज को बोर्ड ने क्या तोहफ़ा दिया. गंभीर और रैना के अधीन एक अदने से खिलाड़ी के रूप में टीम में शामिल कर लिया.
अनुभव की बात करें, तो युवराज ने 274 एक दिवसीय मैच खेले हैं जबकि गौतम गंभीर ने सिर्फ़ 114 और सुरेश रैना ने 115. ये सही है कि आईपीएल में युवराज के नेतृत्व वाले पुणे वॉरियर्स ने कोई अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है.
लेकिन आईपीएल दूसरे तरह का खेल है. फटाफट, जिसमें गुणवत्ता के आधार पर लिए गए कई फ़ैसले पलभर में फ़ुस्स हो जाते हैं. अगर बोर्ड ने आईपीएल में युवराज की कप्तानी को आधार बनाकर उन्हें किनारे किया है, तो ये उनकी नादानी है.
क्योंकि उन्होंने टीम में कई ऐसे खिलाड़ियों को शामिल किया है जो घरेलू क्रिकेट में अच्छा खेले हैं न कि आईपीएल में.
युवराज का ये दुर्भाग्य है कि उन्होंने कई बार मौक़े उनके हाथ से निकल गए हैं. इनमें कुछ हद तक उनकी ख़ुद की ग़लती भी रही है. मैदान के बाहर व्यवहार और लाइफ़ स्टाइल के कारण सुर्ख़ियों में रहने के कारण युवराज को आसानी से लिया जाने लगा.
हालाँकि धोनी के भारतीय क्रिकेट परिदृश्य में आने से पहले युवराज को भारतीय टीम के भविष्य का कप्तान माना जाने लगा था. अपने वनडे करियर के दूसरे मैच में ही युवराज ने जेसन गिलेस्पी और मैकग्रॉ जैसे आक्रमण के सामने 82 गेंद पर 84 रन ठोंक डाले थे.
क्रिकेट प्रेमियों को जुलाई 2002 में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ नैटवेस्ट सिरीज़ के फ़ाइनल में युवराज और कैफ़ की शानदार बल्लेबाज़ी भूली नहीं होगी. युवराज ने बेहतरीन पारी खेली थी और फिर असंभव सी लगने वाली जीत को उन्होंने कैफ़ के साथ मिलकर आसान कर दिया था.
उसी जीत के बाद सौरभ गांगुली ने लॉर्डस की बाल्कनी में अपनी जर्सी उतारकर जीत का जश्न मनाया था. वर्ष 2007 में हुए पहले ट्वेन्टी-20 विश्व कप में तो युवराज ने इंग्लैंड के ख़िलाफ़ मैच में स्टुअर्ट ब्रॉड के एक ओवर में छह छक्के मारे थे.
दुनिया के किसी भी आक्रमण के सामने आसानी से धमाकेदार शॉट्स लगाने वाले युवराज के खाते में कई ऐसी पारियाँ हैं, जिनसे हर क्रिकेट प्रेमी रोमांचित होता है.
वर्ष 2007 के विश्व कप में भारतीय टीम ने काफ़ी ख़राब प्रदर्शन किया. जब राहुल द्रविड़ ने वनडे की कप्तानी छोड़ी और धोनी को कमान मिली तो युवराज को टीम का उप कप्तान बनाया गया था.
लेकिन एक समय कप्तानी का दावेदार खिलाड़ी पहले धोनी का डिप्टी बना और फिर धीरे-धीरे उसकी ये जगह भी हाथ से जाती रही. लेकिन ये ऐसे समय हो रहा है जब उनका प्रदर्शन अच्छा रहा है.
हद तो तब हो गई जब विश्व कप का स्टार खिलाड़ी हाशिए पर लाकर रख दिया गया है. कहाँ तो इस युवराज का राजतिलक होना चाहिए था और कहाँ ये युवराज अपना हक़ भी नहीं ले पा रहा. धन्य है बीसीसीआई.