Saturday, February 18, 2012

युवराज का दर्द हमारा भी है


कभी-कभी इसका अंदाज़ा नहीं होता कि आने वाला वक्त कैसा होगा. ऐसे ही आने वाले वक्त से बेख़बर जब एक सुबह टीवी पर निगाह गई, तो हर जगह ख़बरें चल रही थी युवराज को कैंसर है.
कुछ महीनों पहले इस ख़बर ने सभी क्रिकेट प्रेमियों को परेशान किया था कि युवराज को ट्यूमर है, लेकिन साथ ही ये भी सूचना दी गई थी कि कैंसर नहीं है.
और अब सभी क्रिकेट प्रेमियों को सकते में डालने वाली ये ख़बर कि युवराज सिंह को कैंसर है. सहसा यक़ीन नहीं हुआ. होता भी कैसे जिस व्यक्ति ने क्रिकेट के माध्यम से क्रिकेट प्रेमियों को कई जश्न वाले दिन दिए हो, एक सेलिब्रिटी हो और ज़िंदादिली की निशानी हो, उसे इस हाल में देखना किसे पसंद होगा.
आशा, निराशा और हताशा के बीच जब आख़िरकार 28 साल बाद भारत ने पिछले साल क्रिकेट का विश्व कप जीता था, तो सभी क्रिकेट प्रेमियों की तरह हमने भी जम कर जश्न मनाया था.
सचिन तेंदुलकर और युवराज सिंह को गले लगकर फूट-फूट कर रोते देखकर शायद ही कोई भारतीय क्रिकेट प्रेमी भावुक नहीं हुआ होगा. अगर क्रिकेट भारत के नस-नस में बसा है, तो सच है वो क्षण रोने वाला ही था.
थोड़ा और पीछे चलते हैं जब वर्ष 2002 में नैटवेस्ट सिरीज़ के फ़ाइनल में युवराज सिंह ने मोहम्मद कैफ़ के साथ मिलकर भारत को शानदार जीत दिलाई थी. वो दिन भी झूमने के थे.
वो दिन भी याद कर लेते हैं जब 2007 में क्रिकेट विश्व कप में हार से भारत का हर क्रिकेट प्रेमी निराश था. इसी साल महेंद्र सिंह धोनी ने अपनी कप्तानी में कुछ अनुभवी तो कुछ युवा खिलाड़ियों की बदौलत भारत को ट्वेन्टी-20 विश्व कप में जीत दिला दी.
उसी प्रतियोगिता में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ मैच में जब युवी का बल्ला चला और ऐसा चला कि स्टुअर्ट ब्रॉ़ड के एक ओवर में छह आसमानी छक्के देखने को मिले. किसने उस बेहतरीन क्षण का लुत्फ़ न उठाया होगा.
लेकिन हम ही कई बार खिलाड़ियों और उनके खेल को लेकर इतने आलोचनात्मक हो जाते हैं कि हमें अंदाज़ा ही नहीं होता कि वे कितने दबाव में, कितनी विपरीत परिस्थितियों में खेलते हैं.
पिछले साल के विश्व कप को याद कीजिए और याद कीजिए युवराज की कई बेहतरीन पारियाँ. भारत जीता. किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया कि मैदान पर खाँसते, उल्टियाँ करते युवराज कितनी बड़ी बीमारी पाले हुए हैं.
युवराज और उनके परिवार को पता था कि युवराज की बीमारी गंभीर है, लेकिन युवराज ने खेलने का फ़ैसला किया. ख़िताब जीतने के बाद उनकी आँखों से लगातार निकलती अश्रुधारा सारी कहानी बयां कर रही थी.
लेकिन क्रिकेट प्रेमियों को इसका अंदाज़ा बहुत बाद में हुआ कि युवराज अपनी ज़िंदगी को दाँव पर लगाकर विश्व कप में खेल रहे थे.
वही युवराज आज अपने जीवन के अहम मोड़ पर हैं. डॉक्टर कह रहे हैं घबराने वाली बात नहीं, युवराज ठीक हो जाएँगे और फिर मैदान पर आ सकेंगे. युवराज ने भी ट्विटर पर संदेश लिखकर लोगों को भरोसा दिया है कि वे फ़ाइटर हैं और मज़बूत होकर वापस आएँगे.
एक विज्ञापन में युवराज को ये कहते सुना जाता है- जब तक बल्ला चल रहा है....ठाट हैं. जब बल्ला नहीं चलेगा फिर....?????? सफलता में तो सब साथ होते हैं, लेकिन जब चोट लगती है तो ख़ुद को मालूम होता है उसके बारे में.
आज हमें ये जताने की ज़रूरत है कि उनकी इस पीड़ा में हम उनके साथ है. युवराज के चलते क्रिकेट प्रेमियों ने खुशियों के क्षण जिए हैं. अब एक क्रिकेट प्रेमी होने के नाते हमें युवराज को ये बताने की ज़रूरत है कि हमारे लिए उनकी कितनी अहमियत है.

Friday, May 27, 2011

युवराज का राजतिलक कब?



भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड दुनिया का सबसे धनी और शक्तिशाली बोर्ड है, ये हम सब जानते हैं. उसके दमख़म का लोहा पूरी दुनिया मानती है. लेकिन इन सबके बावजूद बीसीसीआई गाहे-बगाहे आपको ये अहसास दिलाना नहीं भूलती कि उसकी औकात क्या है और हम क्रिकेट प्रेमियों की औकात क्या है.

यही बात क्रिकेटरों के साथ भी लागू होती है. क्रिकेटरों को भी ये समझना पड़ता है कि जिस बड़ी संस्था के साए तले उनका करियर चल रहा है, वो समय-समय पर बेवजह उनका टायर पंचर कर सकता है.

विश्व विजेता बने भारतीय टीम को ज़्यादा समय नहीं हुए हैं, लेकिन इस विश्व विजेता टीम के एक अहम किरदार को क्रिकेट बोर्ड उसकी औकात बता रहा है.

विश्व विजेता बनने के बाद मैदान में ख़ुशी से फूट-फूट कर रोने वाले शख़्स को बोर्ड ख़ून के आँसू रुलाने की प्रतिज्ञा कर चुका है, तो आप हम उसका क्या बिगाड़ सकते हैं.

वेस्टइंडीज़ दौरे के लिए भारतीय वनडे टीम का ऐलान हुआ है. विधानसभा चुनाव के नतीजों की मारा-मारी में भारतीय टीम का ऐलान हुआ. सीनियर खिलाड़ियों को आख़िरकार आराम देने की मांग मान ली गई.

महेंद्र सिंह धोनी नहीं जाएँगे, सचिन तेंदुलकर नहीं जाएँगे और ज़हीर ख़ान नहीं जाएँगे. सहवाग तो पहले ही आउट हो चुके हैं. तो घंटों की माथा-पच्ची के बाद बोर्ड ने नए कोच डंकन फ़्लेचर की मौजूदगी में टीम का चयन किया.

टीम की कप्तानी गौतम गंभीर करेंगे और उप कप्तानी सुरेश रैना करेंगे. सिर चकराया कि कहीं युवराज सिंह को भी तो आराम नहीं दिया गया है. लेकिन खिलाड़ियों का नाम देखते-देखते सूची में युवराज सिंह भी उनमें नज़र आए.

सदमा सा लगा. क्या युवराज सिंह भारतीय टीम के उप कप्तान बनने के लायक़ भी नहीं. वैसी स्थिति में जबकि टीम में सहवाग भी नहीं हैं, सचिन भी नहीं हैं और कप्तान धोनी भी नहीं हैं.

सुरेश रैना अच्छे खिलाड़ी हैं और भविष्य में टीम की बागडोर भी संभाल सकते हैं लेकिन युवराज के सामने उन्होंने बहुत कम क्रिकेट खेली है. देखा जाए तो क़ायदे से युवराज को टीम की कप्तानी मिलनी चाहिए थी और वो भी बहुत पहले.
जीत की अहम कड़ी

गौतम गंभीर से क़रीब तीन साल पहले अपने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की शुरुआत करने वाले युवराज ने अपने क्रिकेट जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं लेकिन हर बार वे मुश्किलों से उबर कर एक स्टार खिलाड़ी के रूप में सामने आए हैं.

भारतीय क्रिकेट को उनका योगदान भूलना नहीं चाहिए. धोनी की कप्तानी में भारत दो बार विश्व चैम्पियन बना है, एक बार ट्वेन्टी-20 का तो दूसरी बार 50-50 का. इन दोनों ही विश्व कप में युवराज टीम की रीढ़ साबित हुए हैं.

2011 के विश्व कप में तो कई अहम मौक़े पर न सिर्फ़ बल्ले बल्कि गेंद से भी उन्होंने अपना कमाल दिखाया है. ये कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं कि युवराज भारतीय टीम की ख़िताबी जीत की अहम कड़ी थे.

विश्व कप में मैन ऑफ़ द टूर्नामेंट चुने जाने वाले युवराज को बोर्ड ने क्या तोहफ़ा दिया. गंभीर और रैना के अधीन एक अदने से खिलाड़ी के रूप में टीम में शामिल कर लिया.

अनुभव की बात करें, तो युवराज ने 274 एक दिवसीय मैच खेले हैं जबकि गौतम गंभीर ने सिर्फ़ 114 और सुरेश रैना ने 115. ये सही है कि आईपीएल में युवराज के नेतृत्व वाले पुणे वॉरियर्स ने कोई अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है.

लेकिन आईपीएल दूसरे तरह का खेल है. फटाफट, जिसमें गुणवत्ता के आधार पर लिए गए कई फ़ैसले पलभर में फ़ुस्स हो जाते हैं. अगर बोर्ड ने आईपीएल में युवराज की कप्तानी को आधार बनाकर उन्हें किनारे किया है, तो ये उनकी नादानी है.

क्योंकि उन्होंने टीम में कई ऐसे खिलाड़ियों को शामिल किया है जो घरेलू क्रिकेट में अच्छा खेले हैं न कि आईपीएल में.

युवराज का ये दुर्भाग्य है कि उन्होंने कई बार मौक़े उनके हाथ से निकल गए हैं. इनमें कुछ हद तक उनकी ख़ुद की ग़लती भी रही है. मैदान के बाहर व्यवहार और लाइफ़ स्टाइल के कारण सुर्ख़ियों में रहने के कारण युवराज को आसानी से लिया जाने लगा.

हालाँकि धोनी के भारतीय क्रिकेट परिदृश्य में आने से पहले युवराज को भारतीय टीम के भविष्य का कप्तान माना जाने लगा था. अपने वनडे करियर के दूसरे मैच में ही युवराज ने जेसन गिलेस्पी और मैकग्रॉ जैसे आक्रमण के सामने 82 गेंद पर 84 रन ठोंक डाले थे.

क्रिकेट प्रेमियों को जुलाई 2002 में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ नैटवेस्ट सिरीज़ के फ़ाइनल में युवराज और कैफ़ की शानदार बल्लेबाज़ी भूली नहीं होगी. युवराज ने बेहतरीन पारी खेली थी और फिर असंभव सी लगने वाली जीत को उन्होंने कैफ़ के साथ मिलकर आसान कर दिया था.

उसी जीत के बाद सौरभ गांगुली ने लॉर्डस की बाल्कनी में अपनी जर्सी उतारकर जीत का जश्न मनाया था. वर्ष 2007 में हुए पहले ट्वेन्टी-20 विश्व कप में तो युवराज ने इंग्लैंड के ख़िलाफ़ मैच में स्टुअर्ट ब्रॉड के एक ओवर में छह छक्के मारे थे.

दुनिया के किसी भी आक्रमण के सामने आसानी से धमाकेदार शॉट्स लगाने वाले युवराज के खाते में कई ऐसी पारियाँ हैं, जिनसे हर क्रिकेट प्रेमी रोमांचित होता है.

वर्ष 2007 के विश्व कप में भारतीय टीम ने काफ़ी ख़राब प्रदर्शन किया. जब राहुल द्रविड़ ने वनडे की कप्तानी छोड़ी और धोनी को कमान मिली तो युवराज को टीम का उप कप्तान बनाया गया था.

लेकिन एक समय कप्तानी का दावेदार खिलाड़ी पहले धोनी का डिप्टी बना और फिर धीरे-धीरे उसकी ये जगह भी हाथ से जाती रही. लेकिन ये ऐसे समय हो रहा है जब उनका प्रदर्शन अच्छा रहा है.

हद तो तब हो गई जब विश्व कप का स्टार खिलाड़ी हाशिए पर लाकर रख दिया गया है. कहाँ तो इस युवराज का राजतिलक होना चाहिए था और कहाँ ये युवराज अपना हक़ भी नहीं ले पा रहा. धन्य है बीसीसीआई.

Wednesday, August 25, 2010

दुख ही दुख है

तीर्थंकर महावीर से एक जिज्ञासु ने पूछा, 'विभिन्न धर्मशास्त्रों में धर्म-कर्म के तरह-तरह के साधन बताए गए हैं। आपकी दृष्टि में धर्म की क्या व्याख्या है?' महावीर कहते हैं, 'अहिंसा, क्षमा, दया, सत्य, शौच (पवित्रता), संयम, तप, त्याग, विनयशीलता, निष्कपटता आदि धर्म के लक्षण हैं। कर्मकांड को धर्म समझना भ्रम है।'
जो व्यक्ति दूसरे के दुख को देखकर दुखी हो जाता है और उसके हृदय में करुणा उत्पन्न हो जाती है, तो वह धार्मिक है। जो व्यक्ति किसी भी प्रकार का उत्पीडऩ सहन करने के बाद भी अहिंसा पर अटल रहकर क्रोध को पास नहीं फटकने देता, उसे धर्मशास्त्रों में आदर्श क्षमाशील कहा गया है।
महावीर कहते हैं, 'जीव जन्म, जरा और मरण से होने वाले दुख को जानता है, उसका विचार भी करता है, किंतु विषयों से विरत नहीं हो पाता। माया की गांठ सुदृढ़ होती है। आत्मा को दूषित करने वाले भोग-विलासों में निमग्न शरीर को जर्जर करने वाले दुष्कर्मों में रत अज्ञानी और मूढ़ जीव उसी तरह कर्मों से बंध जाता है, जैसे मीठे रस में मक्खी। खुजली होने पर जैसे खुजलाने के दुष्परिणाम को व्यक्ति सुख मानता है, वैसे ही मोहातुर मनुष्य कामजनित दुख को ही सुख मानकर उस में लिप्त रहता है।'
'जन्म, बुढ़ापा, रोग, मृत्यु सभी दुख है और संसार दुख की खान। जीवन को सार्थक करने का साधन न जानने के कारण मूढ़ व्यक्ति मृत्यु तक दुखरूपी संसार की यातनाएं सहन करता रहता है। जो व्यक्ति मिथ्या तत्व से ग्रस्त होता है, उसकी दृष्टि विपरीत हो जाती है। उसे धर्म अच्छे नहीं लगते।

Friday, August 13, 2010

याद क्यों नहीं आते मनोज कुमार?


मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार। अपनी फिल्मों में उन्होंने भारतीयता की खोज की। उन्होंने यह भी बताया कि देशप्रेम और देशभक्ति क्या होती है। उन्होंने आँसूतोड़ फिल्में बनाईं और मुनाफे से ज्यादा अपना नाम कमाया जिसके कारण वे भारत कुमार कहलाए।

यह किसी भी अभिनेता के लिए कितना दुर्भाग्यपूर्ण हो सकता है कि वह अपने अभिनय के कारण नहीं बल्कि अन्य कारणों से जाना जाए। मनोज कुमार ऐसे ही अभिनेता हैं जो अपनी देशभक्तिपूर्ण फिल्मों के कारण जाने जाते हैं, अपने अभिनय के कारण नहीं।

दिलीप कुमार ट्रेजिडी किंग इसलिए कहलाए कि उन्होंने अपनी फिल्मों में एक उदास, दुःखी और हमेशा असफल, अवसाद से भरे प्रेमी की भूमिकाएँ की। एक बार हिंदी के ख्यात कवि विष्णु खरे ने उन्हें सन्नाटा बुनने वाला अभिनेता कहा था। यानी वे अपनी देहभाषा से, उठने-बैठने और देखने के खामोश तरीके से, अपने फेशियल एक्सप्रेशन से किसी खास मनःस्थिति को इतने भावपूर्ण ढंग से अभिव्यक्त करते थे कि संवाद की जरूरत नहीं थी। वे परदे पर अपनी खामोशी से ऐसा अभिनय करते थे कि सन्नाटा पसर जाता था जिसमें दर्शक एक प्रेमी के दुःख की तमाम आवाजें सुन लिया करते थे। अपने अभिनय कौशल और कल्पनाशीलता से, अपनी खास संवाद अदायगी से, अपनी आवाज के बेहतर इस्तेमाल से दिलीप कुमार से यह संभव कर दिखाया था।

लेकिन मनोज कुमार जाने जाते हैं अपनी देशभक्तिपूर्ण फिल्मों की वजह से। आप दिलीप कुमार का नाम लेंगे तो इसके साथ ही आपके जेहन में उनकी अभिनीत फिल्में और भूमिकाएँ एकाएक याद आ जाएँगी। इसी तरह से राज कपूर को भी याद किया जा सकता है। राज कपूर अपनी फिल्मों की कथावस्तु के कारण ही नहीं, अपनी फिल्मों के गीत-संगीत के कारण ही नहीं, बल्कि अपने एक निर्दोष, भोले और दिल को छू जाने वाली सहज आत्मीयता और मानवीयता के कारण याद आ जाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण उनका अभिनय ही है। लेकिन यही बात मनोज कुमार के बारे में नहीं की जा सकती।

मनोज कुमार का नाम लेंगे तो उनकी फिल्में याद आएँगी लेकिन उनके अभिनय के कारण नहीं, इसके कारण दूसरे होंगे। यानी मनोज कुमार अपने अभिनय के कारण नहीं बल्कि अपनी फिल्मों की कथावस्तु के कारण याद आते हैं। शहीद से लेकर उपकार तक, पूरब-पश्चिम से लेकर क्रांति तक।

फिर जब मैं मनोज कुमार को याद करता हूँ तो मुझे उनसे ज्यादा उनकी फिल्मों के दूसरे चरित्र ज्यादा याद आते हैं जो उनसे ज्यादा सशक्त दिखाई देते हैं। उनकी सबसे ज्यादा लोकप्रिय फिल्म उपकार का उदाहरण लीजिए। मैं जब भी उपकार को याद करता हूँ मुझे मनोज कुमार नहीं प्राण ज्यादा याद आते हैं। आप भी तुरंत याद कर सकते हैं। वह ईमानदार, भावुक, साहसी और अपंग चरित्र। यही अपंग चरित्र पूरी फिल्म में जेहन से अपंग लोगों को बताता है कि मानवीयता क्या होती है, मूल्य क्या होते हैं और रिश्तों का अर्थ क्या होता है?

इसी तरह से शोर में आपको मनोज कुमार से ज्यादा जया भादुड़ी का चरित्र याद आएगा। संन्यासी को याद करेंगे तो हेमा मालिनी या प्रेमनाथ याद आएँगे। पूरब-पश्चिम को याद करेंगे तो सायरा बानो याद आएँगी। रोटी कपड़ा मकान को याद करेंगे तो जीनत अमान याद आएँगी और क्रांति को याद करेंगे तो दिलीप कुमार याद आएँगे। मनोज कुमार शायद याद न आएँ।

मनोज कुमार याद क्यों नहीं आते, इसके कुछ और भी कारण हैं। जैसे उनकी फिल्मों का गीत-संगीत। आप उपकार की याद करिये तो मुझे मन्ना डे का वह कालजयी गाना याद आता है- कसमें वादे प्यार वफा सब, बातें हैं बातों का क्या... कितना ताकतवर बोल हैं, और कैसी कशिशभरी आवाज और क्या विरल धुन। और इसी फिल्म का वह गीत जो आजादी की हर वर्षगाँठ पर बजता है-मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती, मेरे देश की धरती। आपको महेंद्र कपूर याद आएँगे जो यह गाना गाकर हमेशा के लिए अमर हो गए।

फिर पूरब-पश्चिम का वह प्रेम गीत- कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे, तड़पता हुआ जब कोई छोड़ दे, तब तुम मेरे पास आना प्रिये, मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा तुम्हारे लिए। आवाज है मुकेश की। एक दर्दीला गीत। जेहन में हमेशा ठहरा हुआ। और रोटी कपड़ा और मकान के गीत भी याद किए जा सकते हैं। हाय-हाय ये मजबूरी, ये मौसम और ये दूरी..., तेरी दो टकियों की नौकरी में मेरा लाखों का सावन जाए। और वह युगल गीत भी जिसके बोल हैं-मैं ना भूलूँगा, मैं ना भूलूँगी। इसके बाद शोर फिल्म को याद करिये। आपको याद आएँगे उसके बेहतरीन गीत। संतोष आनंद के लिखे गीत-एक प्यार का नगमा है, मौजों की रवानी है, जिंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी-मेरी कहानी है। मनोजकुमार की फिल्मों के हिट गीतों की लंबी फेहरिस्त बनाई जा सकती है लेकिन उनकी लाजवाब भूमिकाओं की नहीं।

शायद इसीलिए मुझे मनोज कुमार याद नहीं आते। याद आते हैं तो सिर्फ इसलिए कि अभिनय के नाम पर वे अपना चेहरा छिपाते हैं।

Saturday, March 20, 2010

"मेरी सोच और हालात"

अस्तित्व मे तुम्हारे
हर वक्त तूफ़ान है
जिससे तुम्हे हरदम
लडना है मगर
मेरे और तुम्हारे
दरमिया
दो अलग हालात के मन्जर है
तुम्हारी सोच के
मुताबिक हालात नही है
और
मेरी सोच और हालात
दोनो एक है,
तुम उपलब्ध हो
ज़िन्दगी को संवारने
के लिए
और
मै बेताब हूं
ज़िन्दगी को तराशने के लिए.

Thursday, January 28, 2010

बसंती हवा

हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ।

सुनो बात मेरी -
अनोखी हवा हूँ।
बड़ी बावली हूँ,
बड़ी मस्त्मौला।
नहीं कुछ फिकर है,
बड़ी ही निडर हूँ।
जिधर चाहती हूँ,
उधर घूमती हूँ,
मुसाफिर अजब हूँ।

न घर-बार मेरा,
न उद्देश्य मेरा,
न इच्छा किसी की,
न आशा किसी की,
न प्रेमी न दुश्मन,
जिधर चाहती हूँ
उधर घूमती हूँ।
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!

जहाँ से चली मैं
जहाँ को गई मैं -
शहर, गाँव, बस्ती,
नदी, रेत, निर्जन,
हरे खेत, पोखर,
झुलाती चली मैं।
झुमाती चली मैं!
हवा हूँ, हवा मै
बसंती हवा हूँ।

चढ़ी पेड़ महुआ,
थपाथप मचाया;
गिरी धम्म से फिर,
चढ़ी आम ऊपर,
उसे भी झकोरा,
किया कान में 'कू',
उतरकर भगी मैं,
हरे खेत पहुँची -
वहाँ, गेंहुँओं में
लहर खूब मारी।

पहर दो पहर क्या,
अनेकों पहर तक
इसी में रही मैं!
खड़ी देख अलसी
लिए शीश कलसी,
मुझे खूब सूझी -
हिलाया-झुलाया
गिरी पर न कलसी!
इसी हार को पा,
हिलाई न सरसों,
झुलाई न सरसों,
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!

मुझे देखते ही
अरहरी लजाई,
मनाया-बनाया,
न मानी, न मानी;
उसे भी न छोड़ा -
पथिक आ रहा था,
उसी पर ढकेला;
हँसी ज़ोर से मैं,
हँसी सब दिशाएँ,
हँसे लहलहाते
हरे खेत सारे,
हँसी चमचमाती
भरी धूप प्यारी;
बसंती हवा में
हँसी सृष्टि सारी!
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!